है ये रात कैसी मै क्या गुणगुणऊ..
सुबाह कि मेहेफिल में मै क्या गीत गाऊ..
वक्त गुजरता है अपने वक्त के साथ
मेरे वक्त का पता मैं कहां से लावू ..
रोक ना चाहु, कुछ लमहो को
रोक ना पाऊ
छु ना चाहु गुजरती हुई परचाइयोंको
छु ना पाऊ
तोड ना चाहु जिंदगी कि काटे कि घडी को
तोड ना पाऊ
वक्त गुजरता है अपने वक्त के साथ
मेरे वक्त का पता मैं कहां से लावू ..
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वक्त का इंतजार किया,
लेकीन समय हाथो से निकलता गया
घडी घडी कि मुश्कीलो से
अपणो से बिखरता गया,,
लेकिन वो हाथ भी कैसे छुटे
जो मुजसे मिले थे,
उनहीं हाथो कि बदोलत
खुदको संभलता गया,,